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जैसन को तैसन: हरेश्वर राय

जैसन को तैसन: हरेश्वर राय बात बहुत पुरानी है। जितौरा नाम की एक छोटी सी रियासत थी। इस रियासत के मालिक थे महाराज झौवा सिंह। झौवा सिंह की इस रियासत के अंतर्गत बचरी नाम का एक गाँव था। इस गाँव में बैकुंठ नाई एवं यमुना पंडित नामक दो व्यक्ति रहा करते थे। दोनों में प्रगाढ़ मित्रता थी। एक समय की बात है। बैकुंठ को एक अति आवश्यक कार्य से कुछ दिनों के लिए गाँव छोड़कर शहर जाने की आवश्यकता आ पड़ी। उसके पास चाँदी की एक चमचमाती कटार थी जिसे वह चोरी के डर से अपने सूने घर में छोड़कर नहीं जाना चाहता था। अतः अपने प्रस्थान के पूर्व उसने अपनी समस्या अपने मित्र यमुना पंडित को बताई। बैकुंठ की समस्या का समाधान बताते हुए यमुना पंडित ने कहा- “अरे मित्र, भला यह भी कोई समस्या है। अपनी कटार तुम मेरे पास छोड़ जाओ और वापस आते ही तुम उसे पुनः ले लेना।” यमुना पंडित की सलाह मानकर बिना किसी हिचकिचाहट के बैकुंठ ने अपनी कटार अपने मित्र को सौंप दी तथा निश्चिंत होकर वह शहर के लिए प्रस्थान कर गया। नाई की चमचमाती कटार देखकर पंडित के अंदर लालच ने घर कर लिया। कटार के प्रति उसे बहुत मोह हो गया। मन ही मन उसने कटार को वापस न लौट...

आत्मविश्वास लौट आया: हरेश्वर राय

आत्मविश्वास लौट आया: हरेश्वर राय शाम का समय था। साढ़े पाँच बजे थे। समीर विद्यालय से वापस लौटा। कपड़े बदलकर उसने हाथ-मुँह धोये। जलपान करने के बाद रोज की तरह वह बालकनी में पड़ी आरामकुर्सी पर जा बैठा। बालकनी के सामने वाले मैदान में ढेर सारे बच्चे खेल रहे थे। दूर आकाश में रंग-बिरंगी पतंगे उड़ रही थीं। विभिन्न प्रकार के पक्षी आकाश मार्ग से अपने-अपने नीड़ की ओर लौट रहे थे। सूरज भी बस अब डूबने ही वाला था। आकाश लाल हो चुका था। शाम का दृश्य देखते-देखते आठवीं कक्षा का तेरह वर्षीय समीर विचारों में खो सा गया। “मेरी वार्षिक परीक्षा शुरू होने में अब मात्र तीन माह शेष हैं। परीक्षा की तैयारी में मुझे जी-जान से लग जाना चाहिए। सफलता प्राप्त करने के लिए मुझे कठिन परिश्रम करना होगा।” “परन्तु क्या मैं इस वर्ष भी परीक्षा पास कर पाऊँगा? नहीं, नहीं। मेरे लिए परीक्षा पास करना टेढ़ी खीर है, असंभव है। निराशा की गिरफ्त में जकड़ा वह सोचता चला गया। “गत वर्ष भी तो मैंने कठिन परिश्रम किया था। क्या परिणाम निकला? फेल तो हो गया था। मात्र बीस प्रतिशत अंक आए थे। मेरा परिणाम जानकर मम्मी अत्यंत निराश हो गई थीं। कई दिनों ...

कर्म का फल: हरेश्वर राय

कर्म का फल: हरेश्वर राय प्रजापति दक्ष ब्रह्माजी के पुत्र थे। उनकी कन्याओं में से एक का नाम था सती। सती महान शिव भक्त थीं। उनका विवाह भगवान शिव के साथ संपन्न हुआ। इस विवाह के बाद एक दिन प्रजापति दक्ष नैमिषारण्य नामक तीर्थस्थल पर पहुँचे। शिवजी सहित अनेक देव, मुनि एवं ऋषि वहाँ उपस्थित थे। दक्ष को देखकर सभी ने सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया। परन्तु भगवान शंकर ने ऐसा नहीं किया। दक्ष को उनका यह व्यवहार अपमानजनक लगा। वे अत्यंत कुपित हो गए। मन ही मन उन्होंने भगवान शंकर से बदला लेने का निर्णय लिया। इस घटना के कुछ दिनों के बाद दक्ष ने कनखल नामक स्थान पर एक यज्ञ का आयोजन किया। शिव को अपमानित करने का उन्हें अच्छा मौका मिल गया। अतः उन्होंने इस अवसर पर भगवान शंकर को आमंत्रित नहीं किया। सभी आमंत्रित देव, मुनि एवं ऋषि यज्ञ के आयोजन स्थल पर पहुँचे। शिव को अनुपस्थित पाकर महर्षि दधीचि ने इसका कारण जानना चाहा। उत्तर में दक्ष ने भगवान शंकर के लिए अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया। उन्होंने शिव को यज्ञ-भाग के लिए अयोग्य बताया। महर्षि दधीचि क्षुब्ध हो गए। नाराज होकर वे अपने आश्रम लौट गए। इसके बाद यज्ञ प्रारंभ...

मीठू की आजादी: हरेश्वर राय

मीठू की आजादी: हरेश्वर राय बात बहुत पुरानी है। एक गाँव में एक पंडित जी रहते थे। उनके पास मीठू नाम का एक तोता था। वही उनकी रोजी-रोटी कमाने का एकमात्र साधन था। मीठू को पिंजरे में लेकर पंडित जी प्रतिदिन शहर चले जाते थे। वहाँ सड़क के किनारे एक पेड़ के नीचे अपना आसन डाल दिया करते थे। पंडित जी भविष्य वक्ता थे। मीठू की सहायता से वे इच्छुक लोगों के भविष्य के बारे में बतलाया करते थे। मीठू के पिंजरे के सामने पड़े लिफाफों में लोगों का भविष्य बंद रहता था। पंडित जी का इशारा होते ही मीठू उन लिफाफों में से एक लिफाफा अपनी चोंच में उठा लेता था। पंडित जी उस लिफाफे में पड़े कागज के टुकड़े को निकालकर खास अंदाज में पढ़ दिया करते थे। सामने बैठे व्यक्ति अपना भविष्य जान लेने के बाद पंडित जी को दक्षिणा दिया करते। पैसे देने वाले लोगों की मूर्खता और अंधविश्वास पर मीठू को बहुत दया आती थी। वर्षों से लिफाफे निकालते-निकालते मीठू उब गया था। वह कैद से मुक्त होना चाहता था। उसे अपनी मुक्ति का कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था। पंडित जी भी बहुत सजग रहते थे। वे पिंजरे का दरवाजा हमेशा अच्छी तरह बंद रखते थे। एक दिन की बात है...

जड़ावर: हरेश्वर राय

जड़ावर: हरेश्वर राय बात बहुत पहले की है। बिहार प्रान्त के शाहाबाद अंचल में एक छोटी सी जागीर थी। नाम था जगदीशपुर। उस जागीर के मालिक थे- बाबू कुँवर सिंह। उनकी भोजपुरी भाषी प्रजा आदर से उन्हें 'बाबू साहेब' कहा करती थी। बाबू साहेब अत्यंत ही अख्खड़ मिजाज के व्यक्ति थे। वे अपनी बहादुरी, साहस, न्यायप्रियता एवं उदारता के लिए काफी लोकप्रिय थे। वे हमेशा अपनी प्रजा की भलाई के लिए तत्पर रहा करते थे। अतः उनके शासनकाल के दौरान जगदीशपुर में अमन-चैन का साम्राज्य कायम था तथा वहाँ की प्रजा सन्तुष्ट एवं खुशहाल थी। बाबू साहेब के दरबार में बसावन नाम का एक मसखरा [विदूषक] रहा करता था। वह अत्यंत ही चालाक एवं कुशाग्र बुद्धि का व्यक्ति था। सभी दरबारी उसे बहुत चाहते थे। बाबू साहेब भी उसकी प्रतिभा के कायल थे। फुर्सत के क्षणों में बसावन बाबू साहेब को चुटकुले, कहावतें, व्यंग्य कहानियाँ एवं कवितायें आदि सुनाकर उनका मनोरंजन किया करता था। उसकी बातें इतनी चुटीली होती थीं कि बाबू साहेब हँसते-हँसते लोटपोट हो जाते थे। विषम परिस्थितियों में भी बाबू साहेब बसावन से सलाह-मशविरा किया करते थे। बाबू कुँवर सिंह अपने सभी ...

कुकुरदई मंदिर: हरेश्वर राय

कुकुरदई मंदिर: हरेश्वर राय छत्तीसगढ़ के गाँवों में रहने वाले लोगों की यह आम धारणा है कि बहुत पहले छत्तीसगढ़ में छः माह के दिन और इतने ही समय की रातें हुआ करती थीं। उसी समय की बात है। एक गाँव में रामनाथ साहू नाम का एक साहूकार रहता था। वह चावल का व्यापार कर अपने परिवार का भरण-पोषण किया करता था। एक समय की बात है। वर्षाभाव के कारण छत्तीसगढ़ में भयंकर अकाल पड़ गया। धान की फसल पूरी तरह चौपट हो गई। रामनाथ का व्यापार पूर्णतः ठप्प हो गया। उसकी आर्थिक स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई। वह दाने-दाने के लिए मोहताज हो गया। उसका परिवार भूखे मरने लगा। अतः वह पड़ोसी गाँव के एक मालगुजार के पास कर्ज मांगने के लिए गया। वह मालगुजार बहुत ही कृपण एवं निर्दयी था। काफी अनुनय-विनय करने पर भी वह रामनाथ को कर्ज देने के लिए तैयार नहीं हुआ। कर्ज प्राप्त करने के लिए अंततः रामनाथ को उस मालगुजार के पास अपने कुत्ते टीपू को गिरवी रखना पड़ा। तय यह हुआ कि कर्ज वापसी के समय रामनाथ टीपू को वापस ले जाएगा। टीपू एक ऊँचे कद वाला कुत्ता था। वह बहुत तेज, चालाक एवं वफादार भी था। पूरी रात वह मुस्तैदी के साथ मालगुजार की हवेली की सुरक्षा...

गीता का बीसवाँ अध्याय: हरेश्वर राय

गीता का बीसवाँ अध्याय: हरेश्वर राय बहुत पहले की बात है। भोजपुर अंचल में डिहरा नाम का एक छोटा सा गाँव था। गाँव के बाहर था एक भव्य मंदिर। इस मंदिर के प्रांगण में पीपल का एक विशाल वृक्ष था। उसके नीचे एक पक्का ओटला था। एक बार की बात है कि एक संत जी महाराज ने इस वृक्ष के नीचे अपना आसन डाला। उनका व्यक्तित्व आकर्षक था तथा उनकी वाणी अत्यंत मधुर थी। ग्रामीण संतजी महाराज से अत्यंत प्रभावित हो गए। उन्होंने उनसे प्रवचन करने का आग्रह किया जिसे वे ठुकरा न सके। अगल-बगल के गाँवों में इस आशय की सूचना भिजवाई गई। मंच बनाया गया। प्रवचन के लिए अन्य सारी आवश्यक व्यवस्था की गई। प्रवचन प्रारम्भ होने के दिन मंदिर के प्रांगण में अच्छी-खासी भीड़ जमा हो गई। प्रवचन प्रारम्भ करने के पहले संत जी महाराज ने उपस्थित श्रोताओं से एक सवाल पूछा- “आप लोगों में से कितने लोगों ने गीता का बीसवाँ अध्याय पढ़ा है या सुना है? कृपया हाथ ऊपर करें।” यह सुनकर लगभग सभी लोगों ने हाथ ऊपर उठा दिए। संतजी महाराज का हृदय करूणा से भर गया। संत जी महाराज ने आगे कहा- “अरे वाह! आप लोग तो प्रबुद्ध श्रोता हैं। अब मुझे गीता पर प्रवचन करने में असु...